लोकप्रियतावाद, स्वतंत्रता और लोकतंत्र

अभिव्यक्ति की आज़ादी को बचाने का सबसे अच्छा तरीका मतदान है

पिछले हफ्ते जयपुर में सलमान रश्दी के सामने भारत सरकार ने दूसरी बार घुटने टेक दिए। यह हमारे लिए चिंता की बात होनी चाहिए। उनकी पुस्तक सेटेनिक वर्सेज़ पर मुस्लिम ‘भावनाओं’ के सामने राजीव गांधी सरकार की हार ने प्रतिस्पर्धी असहिष्णुता की एक प्रक्रिया की शुरुआत की थी। इसने ऐसा माहौल बना दिया है कि कहीं भी कोई भी धार्मिक भावनाओं के आहत होने का हवाला देकर किताबों, फिल्मों और कलाकृति पर बंदिश लगवा सकता है और रचनाकार को दंडित करवा सकता है। अतीत की गलतियों से सबक लेने के लिए ढाई दशक काफी होते हैं ताकि ऐसी गलतियों को दोहराया न जाए। जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में सलमान रश्दी की मौजूदगी से यूपीए सरकार और बेहतर तरीके से निपट सकती थी। उसके पास मौका था कि वह न सिर्फ प्रतिस्पर्धी असहिष्णुता की धारा को उलट देती, बल्कि राजनीतिक परिदृश्य में भी ऐसा कर के अपनी स्थिति को मजबूत कर पाती।

इसके बावजूद कांग्रेसनीत तंत्र एक बार फिर नाकाम रहा। उसने ज्यादा से ज्यादा यही किया कि वहां हिस्सा लेने आए लोगों में भय और अनिश्चय का भाव पैदा कर डाला। जो लोग यह मानते हैं कि सरकार का पहला कर्तव्य नागरिकों की हिंसा से रक्षा करना है, वे इसी निष्कर्ष पर पहुंचे होंगे कि दिल्ली की यूपीए सरकार और जयपुर में बैठी कांग्रेसी सरकार ऐसा करने में नाकाम हो गई है। एक नागरिक क्या कर सकता है और क्या नहीं, यदि यह हिंसावादी लोगों को ही तय करना है तो फिर हमें सरकार की ज़रूरत ही क्यों है?

जवाब आता है, ”मामला यूपी चुनावों का है”, गोया हमारे मूलभूत अधिकार विधानसभा चुनावों से जुड़ी राजनीतिक मजबूरियों के बंधक हों। अपने समर्थन वाली पार्टी को होने वाले लाभ-नुकसान के चश्मे से हर चीज़ को देखने वाले नेता तो यह तर्क देंगे ही, लेकिन नागरिकों को क्या पड़ी है कि वे इस बहाने और तर्क को मान लें?

पलट कर एक और जवाब मिलता है, ”लेकिन भारतीय संविधान के तहत बुनियादी अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं और सरकार के पास उन पर विवेकपूर्ण तरीके से बंदिशें लगाने का अधिकार है।” यह बयान सटीक है। संविधान सभा की बहसों से लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और संवैधानिक कानून पर जानकारों की राय तक इस बात में कोई शंका नहीं कि भारतीय गणराज्य दरअसल व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच एक संतुलन साधने का काम करता है। इसीलिए कभी-कभार सरकारों द्वारा व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्वतंत्रता में कटौती की कार्रवाइयां संवैधानिक रूप से वैध होती हैं। इससे सरकारों को ज़रा लचीलापन भी मुहैया हो जाता है। यह तर्क देना हास्यास्पद होगा कि संविधान बनाया ही इस तरह से गया है कि सरकार हिंसा की धमकियों के आगे झुक जाने को मजबूर हो जाती है। किसी भी सरकार की नाकामी या ढीलेपन के लिए संविधान को दोष देना गलत होगा।

फिर इस पूरे प्रकरण से क्या निष्कर्ष निकलता है? जैसा कि आंद्रे बेतेले संवैधानिक नैतिकता पर अपने बेहतरीन निबंध में लिखते हैं, भारतीय व्यवस्था संविधानवाद और लोकप्रियतावाद के बीच झूलती रहती है, जिसमें संविधानवाद स्वतंत्रता का आग्रह करता है तो लोकप्रियतावाद उसे दबाता है। आखिर लोकप्रियतावाद को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बरक्स क्यों रखा जाना चाहिए?

इसे दूसरे शब्दों में कहें तो, एक सरकार को असहिष्णु लोगों की मांगों के आगे क्यों झुक जाना चाहिए और उदारपंथियों के आगे क्यों नहीं? यह सवाल तकरीबन ऐसे ही जैसे यह पूछना कि ”महिलाओं के लिए सड़क पर वलना असुरक्षित क्यों है, हमारी अदालतों को कोई मामला निपटाने में इतना वक्त क्यों लगता है, कोई कारोबार शुरू करने के लिए हमें ढेर सारे लाइसेंस क्यों लेने पड़ते हैं, हमारे बच्चों को अच्छे स्कूलों में प्रवेश मिलने में इतनी दिक्कत क्यों आती है, हमें पीने के लिए साफ पानी, बिजली, अस्पताल और फलाना-फलाना क्यों नहीं मुहैया हैं… ?” लोग भी समझते हैं कि इन मुद्दों से निपटे जाने की ज़रूरत है और इस पर आम राय भी है, फिर सरकार इन लक्ष्यों को पूरा करने को लेकर गंभीर क्यों नहीं दिखती?

जवाब सुनकर आप चौंक सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय लोकतंत्र बिल्कुल सही तरीके से काम कर रहा है और अपने मतदाताओं की मांगों के प्रति संवेदनशील है। मतदाता को जो चाहिए वह उसे मिल रहा है। हां, पूरी आबादी को नहीं मिल रहा। भारत में सार्वजनिक विमर्श पर मध्यवर्ग का कब्ज़ा है, और ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि यह हमारे मीडिया के लिए बड़ा बाज़ार है। मध्यवर्ग यह मानता है कि उसके अपने मुद्दों को ही राजनीतिक दलों और सरकार का भी मुद्दा होना चाहिए। जब उसे लगता है कि ऐसा नहीं हो रहा तो वह निराश हो जाता है और शराब की बोतल को लात से मारने वाले किसी शराबी की मुद्रा में निराशावाद के सागर में गोते खाने लगता है।

लाकतंत्र संख्याओं का खेल है। जिनकी संख्या ज्यादा है, वे भारतीय संविधान में दी गई रियायतों का इस्तेमाल कर के काफी हद तक अपना काम करवा सकते हैं। अब यह मान लेना तो अव्यावहारिक होगा कि हमारा संविधान कुछ कम लचीला होता। इसके बावजूद हर इच्छा को पूरा करने वाला सेंटा क्लॉज़ हमेशा नहीं मिलता। या ये संभव है कि हम लोकतंत्र का अभ्यास शुरू कर दें। पुरानी इंडियन लिबरल पार्टी की विफलता पर बोलते हुए डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने 1943 में ”उस बुनियादी तथ्स” की ओर ध्यान खींचा था कि ”किसी भी उद्देश्य को पूरा करने के लिए संगठन ज़रूरी है, और खासकर राजनीति में तो कतई है, जहां तमाम बिखरे हुए तत्वों को एक साथ लाने का काम बहुत वृहद् होता है।”

एक समान लक्ष्य वाले लोगों का संगठन बनाने का काम तकनीक ने आसान कर दिया है। जैसा कि अतानु डे कहते हैं, स्वैच्छिक मतदाता संघ बनाने से एक मतदाता और ज्यादा प्रभावी हो सकता है। यह काम पहले ही हो चुका है- युनाइटेड वोटर्स ऑफ इंडिया नाम के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ज़रा नज़र डालिए।

इसके बावजूद आखिरी सत्य यही है कि आबादी का कितना हिस्सा प्रभावी मतदाता में तब्दील हो पाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह आप पर निर्भर है कि आप वोट देते हैं या नहीं। यदि नहीं देते हैं, तो फिर राजनीतिक दलों या सरकारों को काहे का दोष देना कि वे मतदाताओं की इच्छा पूरी करने में लगे हैं?

Original english post: http://acorn.nationalinterest.in/2012/01/30/populism-freedom-and-democracy/

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